रुपया ₹91 प्रति डॉलर क्यों गिरा? असली वजह और आगे क्या होगा

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डॉलर के मुकाबले रुपया ₹91 तक क्यों गिरा? असली वजहें, RBI की सीमाएँ और आम आदमी पर असर

हाल के दिनों में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर लगभग ₹91 प्रति डॉलर के स्तर के पास पहुंच गया। यह खबर सुनते ही आम लोगों के मन में एक ही सवाल उठता है—क्या भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है और सरकार या RBI इसे क्यों नहीं रोक पा रहे? इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें भावनाओं से नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र के मूल नियमों से शुरुआत करनी होगी।

जब कहा जाता है कि “रुपया गिर गया”, तो इसका सीधा मतलब यह नहीं होता कि डॉलर गिरा है। इसका अर्थ यह है कि डॉलर महंगा हो गया है। पहले जहां 1 डॉलर खरीदने के लिए 82–83 रुपये लगते थे, अब वही डॉलर लेने के लिए करीब 91 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। यानी भारत को हर डॉलर के बदले ज़्यादा रुपये देने पड़ रहे हैं।

डॉलर की जरूरत भारत को क्यों पड़ती है?

भारत अपनी ज़्यादातर अंतरराष्ट्रीय खरीद-फरोख्त डॉलर में करता है। कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, केमिकल्स और यहां तक कि कई खाद्य पदार्थ भी डॉलर में खरीदे जाते हैं।
मान लीजिए भारत रोज़ 50 लाख बैरल तेल आयात करता है। अगर तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल है, तो भारत को डॉलर में भुगतान करना होगा। जब डॉलर महंगा होता है, तो वही तेल भारत के लिए रुपये में और ज्यादा महंगा हो जाता है।

यहीं से समस्या शुरू होती है।

रुपया क्यों कमजोर हुआ? असली कारण क्या हैं?

रुपये की कमजोरी की सबसे बड़ी वजह है डॉलर की कमी। जब देश में डॉलर कम आते हैं और ज़रूरत ज़्यादा होती है, तो उसकी कीमत बढ़ती है।

पहला कारण है विदेशी निवेश (FDI) में गिरावट। पहले विदेशी कंपनियां भारत में फैक्ट्रियां लगाती थीं, स्टार्टअप्स में निवेश करती थीं और शेयर बाज़ार में पैसा डालती थीं। इससे भारत में डॉलर आते थे। लेकिन हाल के समय में वैश्विक अनिश्चितता, ऊंची ब्याज दरें और नीति संबंधी आशंकाओं के कारण FDI भारत में कम हुआ है।

दूसरा बड़ा कारण है एक्सपोर्ट से कमाई में गिरावट। भारत अपने उत्पाद अमेरिका और यूरोप जैसे बाज़ारों में बेचकर डॉलर कमाता है। लेकिन अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ, वैश्विक मंदी और मांग में कमी के चलते भारत का निर्यात प्रभावित हुआ है। जब निर्यात घटता है, तो डॉलर की आमद भी घटती है।

तीसरा कारण है सोने और अन्य आयातों की बढ़ती मांग। जब रुपया कमजोर होता है, तो लोग और कंपनियां अपने पैसे को सुरक्षित रखने के लिए सोना खरीदने लगते हैं। सोना डॉलर में आयात होता है, जिससे डॉलर की मांग और बढ़ जाती है और रुपया और दबाव में आ जाता है।

RBI रुपया क्यों नहीं रोक सकता?

यह सवाल सबसे ज़्यादा पूछा जाता है—जब RBI के पास अरबों डॉलर का फॉरेक्स रिज़र्व है, तो वह बाज़ार में डॉलर बेचकर रुपया मजबूत क्यों नहीं कर देता?

असल में RBI ऐसा कर सकता है, लेकिन सीमित समय के लिए। अगर RBI रोज़-रोज़ डॉलर बेचकर रुपये को एक निश्चित स्तर पर रोकने की कोशिश करेगा, तो उसके विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खत्म हो जाएंगे। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार और अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्थाएं इसे “मुद्रा में हेरफेर” मान सकती हैं, जिससे भारत पर व्यापारिक दबाव और प्रतिबंध लग सकते हैं।

इसलिए RBI का काम रुपये को किसी एक रेट पर बांधना नहीं, बल्कि अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना होता है।

आम आदमी पर इसका क्या असर पड़ेगा?

रुपये की गिरावट का असर सबसे पहले महंगाई पर पड़ता है।
तेल महंगा होता है, तो पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ते हैं। ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, तो सब्ज़ी, दूध और रोज़मर्रा की चीज़ें भी महंगी हो जाती हैं।

मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, दवाइयां और इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे होते हैं क्योंकि इनके पुर्जे आयात होते हैं।

अगर कोई छात्र विदेश में पढ़ाई करना चाहता है, तो उसकी फीस अचानक लाखों रुपये ज्यादा हो सकती है। विदेश यात्रा, मेडिकल ट्रीटमेंट और ऑनलाइन विदेशी सब्सक्रिप्शन भी महंगे हो जाते हैं।

सरकार के पास समाधान क्या है?

रुपये को मजबूत करने का कोई जादुई बटन नहीं है। स्थायी समाधान सिर्फ एक है—देश में डॉलर की आमद बढ़ाना

इसके लिए भारत को:
निर्यात बढ़ाना होगा और नए बाज़ार तलाशने होंगे।
अमेरिका और अन्य बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ रिश्ते बेहतर करने होंगे।
विदेशी निवेशकों के लिए स्थिर और भरोसेमंद नीतियां बनानी होंगी।
घरेलू उद्योग को इतना मजबूत बनाना होगा कि आयात पर निर्भरता कम हो।

निष्कर्ष

₹91 प्रति डॉलर का स्तर कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि आर्थिक दबावों का नतीजा है। यह संकेत देता है कि भारत को शॉर्टकट नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति की ज़रूरत है। अगर डॉलर कमाने की क्षमता बढ़ाई गई, तो रुपया अपने आप संभल जाएगा। वरना महंगाई, आयात खर्च और आम आदमी की परेशानियां बढ़ती रहेंगी।

रुपये की यह गिरावट एक चेतावनी है—अब नीतियों को सिर्फ संभालने के लिए नहीं, बल्कि बदलने के लिए कदम उठाने होंगे।


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