
Messi जब लियोनेल मेसी भारत आए
जब Lionel Messi भारत आए, तो यह सिर्फ एक फुटबॉल event नहीं था, बल्कि भारतीय फुटबॉल प्रेमियों के लिए भावनाओं का सैलाब था। 2022 फीफा वर्ल्ड कप जीतने के बाद मेसी को दुनिया का सबसे महान फुटबॉलर माना जाने लगा और ऐसे समय में उनका भारत आना यह संकेत देता था कि भारत भी अब वैश्विक फुटबॉल मानचित्र पर जगह बना रहा है। कोलकाता, मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे शहरों में उनके स्वागत को लेकर जबरदस्त उत्साह था। टिकटों की कीमतें हजारों से लेकर लाखों रुपये तक थीं, फिर भी स्टेडियम खचाखच भर गए। लोगों को उम्मीद थी कि वे मेसी को मैदान पर खेलते देखेंगे या कम से कम फुटबॉल से जुड़ा कोई ऐतिहासिक पल देख पाएंगे।
उम्मीदों से हकीकत तक का सफर
यह उत्साह जल्द ही निराशा में बदल गया, खासकर कोलकाता के सॉल्ट लेक स्टेडियम में। लगभग सत्तर हजार दर्शकों के बीच VIP संस्कृति हावी हो गई। नेताओं और खास मेहमानों ने आगे की सीटें घेर लीं, जिससे आम दर्शकों का नज़ारा पूरी तरह बिगड़ गया। सुरक्षा और मैनेजमेंट की हालत इतनी खराब थी कि फैंस को यह एहसास होने लगा कि उनसे सिर्फ पैसे लिए गए हैं, सम्मान नहीं दिया गया।
गुस्सा, अव्यवस्था और सिस्टम की असफलता
इसी नाराज़गी में कुछ दर्शकों ने कुर्सियाँ और बैनर फेंके। यह किसी खिलाड़ी या खेल के खिलाफ गुस्सा नहीं था, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ आक्रोश था जिसने आम दर्शक को सबसे आख़िर में खड़ा कर दिया। यह दृश्य पूरे देश के लिए शर्मिंदगी का कारण बना और दुनिया के सामने भारत की खेल व्यवस्था की पोल खोल गया।
खेल पीछे, राजनीति आगे
इस घटना के बाद खेल से ज़्यादा राजनीति चर्चा में आ गई। पश्चिम बंगाल के खेल मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, आयोजक को गिरफ्तार किया गया और विपक्ष ने इस पूरे मामले को सरकार पर हमला करने का मौका बना लिया। एक अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल इवेंट राजनीतिक विवाद में बदल गया, जो भारत में खेलों की एक पुरानी समस्या को उजागर करता है।
क्रिकेट बनाम फुटबॉल की सच्चाई
मेसी का दौरा भारत में क्रिकेट और फुटबॉल के बीच की गहरी खाई को भी सामने लाता है। क्रिकेट के पास मजबूत बोर्ड, पैसा, स्पॉन्सर और व्यवस्थित ढांचा है, जबकि फुटबॉल के पास सिर्फ जुनून है, लेकिन ठोस योजना और पेशेवर प्रबंधन की भारी कमी है। मेसी को देखने उमड़ी भीड़ यह साबित करती है कि भारत में फुटबॉल के लिए दर्शकों की कमी नहीं है।
मेसी गए, सवाल छोड़ गए
अंत में मेसी भारत से चले गए, लेकिन पीछे एक बड़ा सवाल छोड़ गए—क्या भारत सिर्फ बड़े नामों के पीछे भागेगा या अपने खेल ढांचे को सुधारने की गंभीर कोशिश करेगा? अगर इस घटना से सही सबक लिया गया और फुटबॉल को राजनीति से बाहर निकालकर प्रोफेशनल सिस्टम में सौंपा गया, तो यही विवाद भविष्य में बदलाव की शुरुआत बन सकता है। वरना मेसी का यह दौरा फुटबॉल उत्सव नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चेतावनी के रूप में याद रखा जाएगा।