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| Russia-Ukraine War Explained |
रूस-यूक्रेन युद्ध क्यों हुआ? नाटो की ज़िद, अमेरिका की भूमिका और ट्रंप की एंट्री का पूरा विश्लेषण
24 फरवरी 2022 को शुरू हुआ रूस-यूक्रेन युद्ध आज के दौर का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक संकट बन चुका है। यह युद्ध केवल दो देशों के बीच की सैन्य टकराव नहीं है, बल्कि इसके पीछे नाटो विस्तार, अमेरिका-रूस प्रतिद्वंद्विता और वैश्विक गुटबंदी जैसी गहरी वजहें छिपी हुई हैं। यूक्रेन की नाटो में शामिल होने की ज़िद इस पूरे संघर्ष की केंद्रीय धुरी बन गई, जिसने दुनिया को महंगाई, ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता की ओर धकेल दिया।
नाटो क्या है और रूस को इससे आपत्ति क्यों है?
नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन 32 देशों का सैन्य गठबंधन है। नाटो का सबसे अहम नियम अनुच्छेद 5 है, जिसके तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में सभी सदस्य देश मिलकर जवाब देते हैं। रूस को डर था कि यदि यूक्रेन नाटो का सदस्य बन गया, तो नाटो की सेनाएं सीधे रूस की सीमा तक पहुंच जाएंगी। रूस इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानता है और यही कारण है कि वह यूक्रेन के नाटो में शामिल होने का खुलकर विरोध करता रहा है।
शीत युद्ध की विरासत और यूक्रेन की भूमिका
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक और सामरिक टकराव शुरू हुआ, जिसे शीत युद्ध कहा गया। इसी दौर में नाटो और वारसा संधि जैसे सैन्य गुट बने। 1991 में सोवियत संघ टूट गया और यूक्रेन एक स्वतंत्र देश के रूप में सामने आया। हालांकि रूस आज भी यूक्रेन को अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता है और पश्चिमी देशों की बढ़ती मौजूदगी को अपने खिलाफ साजिश के रूप में देखता है।
जेलेंस्की की नाटो ज़िद और युद्ध की शुरुआत
2019 में व्लादिमीर जेलेंस्की के राष्ट्रपति बनने के बाद यूक्रेन ने नाटो सदस्यता की मांग को तेज़ कर दिया। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को राजनीतिक और सैन्य सहायता दी, लेकिन नाटो की शर्त साफ थी कि कोई भी युद्धरत देश नाटो में शामिल नहीं हो सकता। रूस इस रणनीति को समझ चुका था और उसने फरवरी 2022 में हमला कर यह सुनिश्चित कर दिया कि यूक्रेन लंबे समय तक युद्ध में फंसा रहे और नाटो सदस्यता की शर्तें पूरी न कर सके।
चार साल का युद्ध और वैश्विक असर
रूस-यूक्रेन युद्ध ने दोनों देशों को भारी नुकसान पहुंचाया। यूक्रेन को अपनी ज़मीन का बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ा, जबकि रूस को भी सैन्य और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। इस युद्ध का असर पूरी दुनिया पर पड़ा—तेल और गैस की कीमतें बढ़ीं, महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची और कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं संकट में आ गईं। भारत समेत कई देशों को अमेरिकी प्रतिबंधों और व्यापारिक दबावों का सामना करना पड़ा।
ट्रंप की वापसी और युद्ध रोकने की कोशिश
अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि यूक्रेन की नाटो ज़िद ही युद्ध का मुख्य कारण है। ट्रंप के दूतों की मध्यस्थता के बाद यूक्रेन ने संकेत दिए कि वह नाटो सदस्यता की मांग छोड़ने को तैयार है। इसके बदले रूस ने यूक्रेन को यूरोपीय यूनियन में शामिल होने की अनुमति देने का संकेत दिया। यूरोपीय यूनियन एक आर्थिक और व्यापारिक समूह है, न कि नाटो जैसा सैन्य गठबंधन, इसलिए रूस को इससे सीधा सैन्य खतरा नहीं दिखता।
क्या युद्ध खत्म होने की ओर है?
यूक्रेन द्वारा नाटो सदस्यता छोड़ने का संकेत युद्ध खत्म होने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि युद्ध पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। रूस अपने कब्जे वाले इलाकों से पीछे हटने को तैयार नहीं है और पश्चिमी देशों की सुरक्षा गारंटी भी सीमित होगी। इसके बावजूद, इतना साफ है कि नाटो का विकल्प यूक्रेन के लिए फिलहाल बंद हो चुका है।
निष्कर्ष
रूस-यूक्रेन युद्ध यह दिखाता है कि किसी एक देश की ज़िद और महाशक्तियों की गुटबंदी पूरी दुनिया को किस तरह संकट में डाल सकती है। यूक्रेन को अंततः वही कदम पीछे हटकर उठाना पड़ा, जिसकी मांग रूस शुरू से कर रहा था। आने वाले समय में इतिहास इस युद्ध, इसके नेताओं और इसके वैश्विक प्रभावों का कठोर मूल्यांकन करेगा।
